मातंग इतिहास

हम इस समय मातंगों की लोग बुक की ताजा प्रविष्टियों को समझने में व्यस्त हैं जिसमे हनुमान जी की इस साल यानि २०१४ में हुई यात्रा का उल्लेख है | इस यात्रा के दौरान हुई वार्ताओं में इतिहास का भी उल्लेख है | लेकिन मातंगों के लिए इतिहास का विषय थोडा सा जटिल है क्योंकि उनके अनुसार इतिहास और भविष्य सब वर्तमान में निहित हैं | इतिहास और भविष्य वास्तव में एक भ्रम है | जीवात्मा के परिपेक्ष्य में वर्तमान ही एकमात्र सत्य है | लेकिन आज का युग पश्चिम की इतिहास , भूगोल और अन्य स्थूल धारणाओं को ज्यादा महत्व देता है इसीलिए हम भी उसी सन्दर्भ में मातंगों की इतिहास की कड़ियों को जोड़कर एक मोटा मोटी तस्वीर खींचने का प्रयास कर रहे हैं | कुछ घटनाओं का उल्लेख हम नीचे कर रहे हैं | जैसे जैसे नई सूचनाएं हमें प्राप्त होंगी , हम यह पृष्ट अपडेट करते रहेंगे |

रामायण काल

सीता एलिया श्री लंका में स्थित वह स्थान है जहाँ रावण ने माता सीता को बंदी बना कर रखा था। माता सीता को सीता एलिया में एक वाटिका में रखा गया था जिसे अशोक वाटिका कहते हैं। जब हनुमान जी सीता माता को ढूंढते हुए सीता एलिया की पहाड़ी पर पहुंचे तब उनकी तलाश पूरी हुई। यहाँ पर उनके पैरों के निशान आज तक मौजूद हैं जो कुछ बहुत बड़े हैं और कुछ बहुत छोटे।

सदियाँ बीतने के बाद भी यहाँ हनुमान जी के चरणों के चिन्ह आज तक ज्यों के त्यों पथ्थरो पर क्यों हैं? क्योंकि यह वह स्थान है जहाँ श्री राम जी की भक्ति में लीन श्री हनुमान को आठवी सिध्धि प्राप्त हुई थी जिसे इष्टवम कहते हैं। जब उन्होंने माता सीता की खोज की तो वे इस आनंद में झूम रहे थे कि उन्होंने प्रभु श्री राम द्वारा दिया कार्य पूरा कर लिया है। उन्होंने इस पहाड़ी पर खड़े होकर श्री राम जी के चरण कमलों का ध्यान किया तो उन्हें एक अद्भुत अनुभव हुआ।

यह वो अनुभव है जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। भक्त का भगवान से एक हो जाने का यह अनुभव शब्दों की सीमा से परे है। इष्टवम वो सिद्धि है जिससे कि एक योगी खुद को परम शक्ति के साथ एक हुआ पाता है। सीता एलिया वह स्थान है जहाँ हनुमान ने अपने भगवान् के साथ एकात्मकता का अनुभव किया। इसीलिए रामायण में सीता की खोज वाले अध्याय (जिसे वाल्मीकि की रामायण में सुन्दर काण्ड कहा गया है ) को सबसे श्रेष्ट माना गया है। वेद वेदांतो का सार और पुराणों का निचोड़ सब उस एक अनुभव की और इशारा करता है जो वर्णन से परे है। वही अनुभव जो हनुमान जी को इस स्थान पर हुआ था।

हनुमान जी का समुद्र पार करना और माता सीता को ढूँढना। समुद्र के एक तरफ श्री राम हैं और दूसरी तरफ माता सीता। जब वे सीता एलिया की पहाड़ी पर खड़े होकर यह ध्यान कर रहे थे तब उन्हें अहसास हुआ कि राम और सीता दोनों उनके मन में ही हैं। और समुन्दर भी उनके मन में ही है। हम इस वर्णन को यही तक छोड़ते हैं क्योंकि यह वो अनुभव है जिसके ऊपर दर्शन शास्त्र की हजारों किताबे लिखी गयी है, भक्ति कवियों ने महाकाव्यों की रचना की है। सीता एलिया के परिचय के लिए इतना बताना काफी है कि यहाँ पर हनुमान जी ने अपनी सभी 8 सिध्धियों को प्रदर्शित किया है। उदाहरण के तौर पर एनिमा नामक सिध्धि से वे परमाणु से छोटा आकार भी धारण कर लेते थे। इसीलिए यहाँ कुछ पैरों के निशान अति सूक्षम हैं और कुछ बहुत बड़े।

हनुमान जी को अमर होने का वरदान प्राप्त हुआ था। श्री राम ने अपने जीवन काल के अंत में हनुमान जी को उनके भक्तों की रक्षा का दायित्व सौंपा था।

कलियुग में :

कलियुग के रिकार्डेड इतिहास में भी कुछ ऐसी घटनाएँ जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। करीब 2600 साल पहले सिंहपुरा (जहाँ आज का गुजरात है ,भारत में ) का एक राजा था जिसका नाम था सिन्हाबाहू। उसके सबसे बड़े बेटे का नाम विजय था जो बहुत बिगडैल था। जब वह 18 साल का था तब उसने राज्य की प्रजा का जीना दूभर कर दिया। वह अपने साथियो के साथ एक दल में रहता था और जनता को परेशान करता रहता था। प्रजा ने राजा सिन्हाबहू से शिकायत की। विजय के न मानने के चलते राजा ने विजय और उनके साथियों को राज्य से निष्कासित करने का आदेश दिया। विजय और उसके 700 साथियों को बिना पतवार के जहाज में बैठाकर समुद्र में भटकने के लिए छोड़ दिया गया। वह जहाज अंत में श्री लंका पहुंचा। वहां पर विभीषण के वंशज राज कर रहे थे। वहां कुवेनी नाम की बुद्धिमान नारी ने अपने पिता से हेलिदापा (लंका) के राज्य की कमान संभाली ही थी। जब वह आर्यावृत से आये हुए युवराज विजय से मिली तो उसे विजय से प्रेम हो गया। विजय ने इस मौके का लाभ उठाकर उससे शादी कर ली और हेलादिपा (लंका) का राजा बन बैठा। यह 544 BC की बात है।

विजय ने कुवेनी के साथ तब तक प्रेम करने का ड्रामा किया जब तक कि राज्य का पूरा नियंत्रण उसके हाथ में नहीं हो गया। इस 5 साल के दौरान कुवेनी को दो संतान हुई -एक लड़का और एक लड़की। उसके बाद विजय ने उसको छोड़ दिया और दक्षिण भारत के मधुरदेश नामक राज्य की राजकुमारी के साथ विवाह कर लिया। उसने कुवेनी ही नहीं उसके बच्चो को भी छोड़ दिया। कुवेनी बाद में मर गयी और उसके बच्चे वनवासी हो गए। इस तरह विजय ने विभीषण की वंशज कुवेनी के साथ छल किया। नया विवाह करने के बाद विजय सीता एलिया में मातंग लोगो से हनुमान पूजा करवाने गया। मातंग रहते तो जंगलों में हैं लेकिन उन्हें अपने हनुमंडल में देखने से हर घटना का पता रहता है। जब विजय पूजा करवाने गया तो एक मातंग ने उसको आगाह किया कि कुवेनी को धोखा देने के परिणाम उसे भुगतने पड़ेंगे। उसके कुल में कुवेनी एक लड़की के रूप में जन्म लेगी जो एक ऐसा बेटा पैदा करेगी जो पूरे कुल का नाश करेगा। मातंग लोग त्रिकालदर्शी होते हैं। वे जानते सब कुछ हैं लेकिन भविष्यवाणी तभी करते हैं जब उसकी जरुरत होती है। और उनकी भविष्य वाणी कभी असत्य साबित नहीं होती। विजय को यह मालुम था। इसलिए उसको नई शादी के बाद जो पुत्रियाँ हुयी उन सबको जन्म लेते ही मरवा दिया। उसको भय था कि वो कन्या कुवेनी का पुनर्जन्म हो सकती है। विधि का ऐसा ही विधान हुआ कि उसको सभी लड़कियां होती गयी और वो उन्हें मरवाता गया। अंत में वह अपनी मृत्यु शैया पर लेटा था और उसका कोई उतराधिकारी नहीं था। उसने सिंहपुरा से अपने भाई के बेटे को बुलावा भेजा ताकि वो लंका राज्य की कमान उसके हाथो में दे सके। उसके भाई के बेटे का नाम पांडू वासुदेव था जो उसके बाद राजा बना।

पांडू वासुदेव को भी मातंग की भविष्य वाणी से अवगत कराया गया कि कुवेनी उसकी कन्या के रूप में जन्म ले सकती है। पांडू वासुदेव ने तर्क दिया कि अगर वह उसकी कन्या के रूप में जन्म ले भी लेगी तो क्या करेगी?पांडू वासुदेव को बताया गया कि मातंग की भविष्यवाणी के अनुसार वह खुद तो कुछ नहीं करेगी परन्तु एक ऐसे पुत्र को जन्म देगी जो पूरे कुल का वध करेगा। पांडू वासुदेब को 10 लड़के और एक लड़की हुई। सलाहकारों की तमाम सलाहों के बावजूद उसने अपनी पुत्री का वध करना उचित नहीं समझा। उसने अपने सलाहकारों को विश्वास दिलाया की उसकी पुत्री का पालन पोषण पूरी देख रेख में किया जाएगा। उसने अपने कक्ष के बगल में अपनी पुत्री का कक्ष बनवाया और उसकी हर समय निगरानी रखने का आदेश दिया गया। लड़की का नाम सिथ्था रखा गया।

एक समय ऐसा आया जब सिथ्था माँ बनने वाली थी। राजा के शुभ चिंतकों में हडकंप मच गया कि मातंग की भविष्य वाणी सिद्ध होने वाली है। सिथ्था के बड़े भाइयों ने भी अपने पिता राजा पांडू वासुदेव को इस समस्या के समाधान के लिए सिथ्था के बच्चे को जन्म लेते ही मार देने का सुझाव दिया। राजा ने मान लिया कि अगर लड़का पैदा होता है तो वे उसे मरवा देंगे। लेकिन सिथ्था के दस भाइयों में से सबसे बड़े भाई राजकुमार अभय को यह उचित नहीं लगा। उसने अपनी बहन को अपने पिता और भाइयो की योजना बता दी जिससे कि सिथ्था सतर्क हो गयी। उसने अपनी दासी को ऐसी औरते ढूंढने के लिए कहा जो लगभग उसी समय जन्म देने वाली हो। उसने निर्देश दिया कि अगर उसको लड़का हो तो उसे किसी अन्य औरत को हुयी लड़की के साथ बदल दिया जाये। ऐसा ही हुआ। सिथ्था ने एक लड़के को जन्म दिया जिसे तुरंत महल से बाहर पहुंचा दिया गया और उसके स्थान पर लड़की रख दी गई। इस लड़के का पालन पोषण सीता एलिया के पास ही रूहाना नगर में हुआ। पान्दुला नाम के ब्राह्मण ने उसकी सिक्षा दीक्षा की और उसका नाम पन्दुकाभय रखा। ब्राह्मण पान्दुला जानता था कि यह बच्चा मातंग की भविष्यवाणी के अनुसार पैदा हुआ है।

जब यह लड़का यानी पंदुकाभय रूहाना नगर में पल बढ़ रहा था तभी सिथ्था के भाइयों को पता चल गया क्योंकि सिथ्था उसके पालन पोषण के लिए महल से मुद्राएँ भेजती थी। तब तक सिथ्था के पिता का निधन हो चूका था और उसका सबसे बड़ा भाई अभय राजा बन गया था। अभय इसके बारे में जानता था। जब उसके अन्य भाइयों को पता चला कि अभय की जानकारी में ही सिथ्था के लड़के को महल में लड़की से बदला गया ,तो सभी भाइयों ने मिलकर अभय को राजा पद से हटा दिया और रहाना नगर में पल रहे इस बच्चे की जान के दुश्मन बन गए। उन्हें इस बच्चे का सही हुलिया नहीं मालुम था इसलिए उन्हें जहाँ भी इस बच्चे के होने की संभावना नजर आई वहां के सभी बच्चों को मरवा दिया। लेकिन यह बच्चा यानि पंदुकाभय हर बार बच गया।

जब पंदुकाभय बड़ा हो गया तो उसने अपने मामा यानी सिथ्था के भाइयों के साथ जबरदस्त युध्ध किया। उनकी सेना के खिलाफ उसने सेना बनाई और एक एक करके सभी को मार गिराया। उसने अभय को छोड़ दिया क्योंकि अभय ने उसकी रक्षा की थी। इस तरह मातंग की भविष्य वाणी सच हुयी और कुवेनी के पुनर्जन्म के बेटे पंदुकभय ने लंका की सता हासिल की। विजयी होने के बाद वह मातंगों से मिलने आया और उनके लिए एक भव्य मंदिर बनवाने का प्रस्ताव रखा। मातंग यह प्रस्ताव सुनकर मुस्कुराये। उन्होंने पंदुकाभय को कुछ पल के लिए दिव्य दृष्टि दी। जब उसने इस दिव्य दृष्टि से वहां स्थित पहाड़ी को देखा तो हनुमान जी अपने विशाल रूप में खड़े थे। उनके चरण पहाड़ी पर थे लेकिन मस्तक आसमान छु रहा था। पंदुकाभय समझ गया कि इतना बड़ा मंदिर बनाना उसके बस की बात नहीं है।

ब्रिटिश काल

ब्रिटिश लोगो ने 1814 में नुवारा एलिया की खोज तब की जब उनके कुछ सिपाही यहाँ के जंगलों में भटक गए। उनके पास न तो खाने के लिए कुछ था न पीने के लिए पानी। उन्होंने सोचा कि इन जंगलों में भटकते भटकते वे मर जायेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहाँ की हवा में ही वो चमत्कार था कि उन्हें न भूख लगी न प्यास। जब वे जंगल से बाहर निकले तो उन्होंने अपने गवर्नर को इस चमत्कारिक स्थान के बारे में जानकारी दी। उस वक़्त वहां के गवर्नर एडवर्ड बार्नेद थे।

1846 में गवर्नर के दोस्त शमूएल बेकर भी लंका में थे (उस वक़्त लंका का नाम सीलोन था ) शमूएल बेकर एक प्रसिध्ध अन्वेषक भी था। वह यहाँ की खूबसूरती को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और उसने वहां पर अपने रहने के लिए महल और फार्म बनाने का फैसला किया। उसे यह कति भी अंदाजा नहीं था कि यह स्वयं हनुमान का स्थान है। वह ब्रिटेन गया और दो साल बाद "पर्ल ऑफ़ हार्ड वीक " नाम के जहाज में अपना महल आदि बनाने के लिए मलबा भरकर लाया। इस बार वह अपने भाइयों को भी साथ लाया था। वह कोलोंबो तक तो इस मलबे को सुरक्षित ले आया लेकिन जब वह इसको गाड़ियों में भरकर नुवारा एलिया की तरफ ला रहा था तो रस्ते में राम्बोदा की पहाड़ी से वे गाडिया फिसल गयी। उस दुर्घटना में उसके भाइयों की भी मौत हो गयी। इस तरह भगवान के घर को इंसान का घर बनाने का एक और प्रयास असफल हो गया।

लेकिन अब यह जंगल कट रहे हैं या सरकार द्वारा कब्जाए जा रहे हैं | लेकिन यह भी श्री हनुमान जी की मर्जी से ही हो रहा है | यह विश्व अंत की तरफ बढ़ रहा है | वैसे हमारी टिप्पणी इन विषयों पर उचित नहीं है | अगर आप हनुमान जी की यात्रा के अध्याय पढेंगे तो आपको स्वयं आत्म दृष्टि प्राप्त होगी जिससे आप सब कुछ अपने आप समझ और देख पायेंगे | आपको किसी के दिमाग से उपजे विवरण की आवश्यकता नहीं होगी |